Tuesday, January 22, 2013

रूठी क़लम




















रूठी क़लम 

क़लम मेरी क्यों सो रही तुम? 
क्या तुम्हें एहसास है ?
क्या है बीती इस ह्रदय पे? 
क्या मेरे जज़्बात हैं ?

क्यों नहीं तुम जागती हो? 
तुम हो ख़ुद प्राची किरण 
तुम हो वो स्वछन्द चिड़िया 
जिसको ना बांधे गगन 

क्यों है ये आलस तुम्हें ?
क्यों सोयी हो शव सी कहो? 
हंस रहे हैं लोग मुझपे 
दम तोड़ता 'लवि' अब जगो 

ग़र नहीं तुम में हो रंग 
मेरे ग़म से लेलो रंग 
मान जाओ मेरी प्रियवर 
फिर न दिखें रूठे बलम ।
                                                      __ संकल्प सक्सेना 'लवि' ।

पूनम





एहसास विमल( Vimalendu Tiwari) के शब्द लवि के 


पूनम 



दिल का साज़ है पूनम 
अस्फ़िया( Pure, clear ,white) रात है पूनम 
जो उपजे दिल की धड़कन से 
अश्हर (famous,Popular) ये गीत है पूनम 

ये ज़ुल्फ़ें रात है पूनम 
बदन ये चांदनी पूनम 
जो होती है तू रातों में 
जवां हर कैकशां पूनम 

आया हूँ मैं कोठे पे 
मेरी तन्हाइयां चुप हैं 
नहीं तू सामने मेरे 
मगर ये रात है पूनम 

तेरी यादों के साए में 
उफ़नता गीत ये पूनम 
क़लम व्याकुल 'लवि' की है 
'विमल' एहसास है पूनम 
                                                           ____संकल्प सक्सेना 'लवि '

Tuesday, November 27, 2012

किनारा ढूँढ़ता हूँ



किनारा ढूँढ़ता हूँ 

नव जन्मों की राहों से, मैं आकर सांस लेता हूँ , किनारा ढूँढ़ता हूँ 
ये स्वागत में खड़ी दुनिया, मैं रोकर मुस्कराता हूँ, किनारा ढूँढ़ता हूँ 

मैं कहता हूँ मैं सुनता हूँ, ज़ुबां से लडखड़ाता हूँ , किनारा ढूँढ़ता हूँ 
मैं गिरता हूँ, मैं उठता हूँ, मैं   उठकर मुस्कराता हूँ, किनारा ढूँढ़ता हूँ 

मेरी राहें, मेरे सपने, फ़लक मंजिल बनाता  हूँ, किनारा ढूँढ़ता हूँ 
मैं जलता  हूँ, मैं तपता हूँ, कनक बन मुस्कराता  हूँ, किनारा ढूँढ़ता हूँ 

मैं बनके प्रेम का झरना, दिलों को पास लाता हूँ , किनारा ढूँढ़ता हूँ 
बहेगी प्रेम की सरिता, ख़ुशी के गीत गाता   हूँ ,  किनारा ढूँढ़ता हूँ 

समाऊंगा मैं ज्योति मैं, मैं दिल से दिल मिलाता हूँ, किनारा ढूंढता हूँ 
मरण शैया पे सोया हूँ , बिदाई गीत गता हूँ, किनारा ढूंढता हूँ  
                                                                                  ___संकल्प सक्सेना 'लवि'।

Thursday, November 15, 2012

मोहब्बत


जन्म लिया और मोहब्बत हो गयी 

पहले माँ से फिर जहां से 



फिर समय बदला 
हुआ परिचय
कहीं धरम , कहीं करम से 



हुआ एहसास यह मिटटी भी माँ है 
खेल कर जीवन की होली 
मुझको भी मरना यहाँ है 
कुछ करम करना यहाँ है 
गोद में सोना यहाँ है 



जीना नहीं कुछ पल मुझे है 
हर पल मुझे जीवित है करना 
मेरे पल के साथियों का 
हर पल मुझे गुलज़ार करना 
मेरे अपने संसार के लिए



हो जहां प्रीतम, मेरा घर 
हो जहां बचपन , मेरा घर
प्रेम की 'लवि' कल्पना में 
मिटटी मेरीभारतमेरा घर



____संकल्प सक्सेना 'लवि'


Tuesday, October 9, 2012

एक बरस पहले






हमारे दिल अज़ीज़ ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह जी को श्रद्धांजलि

एक बरस पहले

एक बरस पहले
रोई थीं ग़ज़लें
सिसकी थीं नज़्में
मौसिक़ी का फ़रिश्ता रुला जा रहा था ।

ग़म था छाया फ़िज़ां में
छलके मयक़दे भी
पीर से दिल का अम्बर फटा जा रहा था
मौसिक़ी का फ़रिश्ता रुला जा रहा था ।

दिल कोने में छिपकर
पीर ग़ालिब की छलकी
मीर के आंसुओं सा बहा जा रहा था
मौसिक़ी का फ़रिश्ता रुला जा रहा था ।

आज भी गूंजती हैं
फ़िज़ा में सदायें
हर्फ़ आते हैं लब पे, जैसे तेरी दुआएं
'लवि' यादों में तेरी बहा जा रहा था
मौसिक़ी का फ़रिश्ता चला जा रहा था
मौसिक़ी का फ़रिश्ता रुला जा रहा था ।

                                                                                ___ संकल्प सक्सेना 'लवि' ।

Sunday, September 23, 2012

राहें


राहें

कुछ ऐसी राहें होती हैं
कुछ ऐसे सपने होते हैं
जो हमको बुन्नी पड़ती है 
जो हमको पाने होते हैं ।

करीब हम उनके जाते हैं
वो शर्मा के मुड़ जाती है
हम छूने जाते हैं उनको
वो नाज़ हमें दिखलाती हैं 

कुछ ऐसी राहें होती हैं ......

दिल से होके वो जाती हैं 
नज़रों में वो बस जाती हैं
हम राहों पे जो बढ़ते हैं
वो अदा हमें दिखलाती हैं

कुछ ऐसी राहें होती हैं ......

मिलता रास्ता पगडंडी से
वो हमसफ़र हो जाते हैं
क़लम से राहें बनती हैं
स्याही सपने भर जाती हैं 

कुछ ऐसी राहें होती हैं
कुछ ऐसे सपने होते हैं
जो हमको बुन्नी पड़ती है 
जो हमको पाने होते हैं ।              
                                  ___ संकल्प सक्सेना                     




Wednesday, September 19, 2012

वृक्ष और बादल


वृक्ष और बादल


बादल कभी बरसे नहीं 
प्यासे इन्सां के लिया
ये तो बरसे हैं उनके लिए
जो झुलसे सबकी छाँव के लिए ।

क्या किया मानव ने उनके लिए
जले जो सबकी छाँव के लिए
क्या जिया कभी है ये ख़ुद भी
और के जीवन प्रान के लिए 

जल जल के तन है हरा किया
महके पवन, वसुधा के लिए
मानव ने चलाई विष वायु
अपने ही निज स्वार्थ के लिए 

इसलिए नहीं बरसे जलधर
जहां इंसां बस्ती बनता है
ये तो बरसे उस तरु के लिए
जो जला है प्यासी माँ के लिए  
                                                                 ___ संकल्प सक्सेना