Friday, September 6, 2013



सायों की रहगुज़र

ता उम्र का सफ़र, सायों की रहगुज़र 
नयनों की राह से, अश्क़ों की रहगुज़र।।

बचपन से जवानी, सायों की ज़ुबानी 
ये खेल समय का, ख़्वाबों की रहगुज़र।।

साँसों में महक है, आँखों में तरन्नुम 
ये दौर-ए-जवानी, बाहों की रहगुज़र।।

जो रूठ गए हैं, वो आ नहीं सकते 
बिछड़े हैं जो साक़ी, जामों की रहगुज़र।।

आहों के सहारे, हर्फों की रहगुज़र
साये में क़लम के, ग़ज़लों की रहगुज़र।।
                                                __ संकल्प सक्सेना 'लवि'।

Saturday, August 3, 2013

तन्हाई 

नीला नभ है, नीला सागर 
बीच में है आशाओं का घर 
खोल के खिड़की देख रहा हूँ 
अम्बर तक तन्हाई का घर।

तट रेखा से, क्षितिज पटल तक 
नैनो से फिर हृदय पटल तक 
नील नभी तन्हाई छाई 
यादों की विस्मृत शहनाई।

मैं जो देखूं खिड़की बाहर 
दूर तलक सागर ही सागर 
क्षार हुई अंसुवन से मेरे 
छलकी है लहरों की गागर।

उमस रहा है तन मन मेरा 
नहीं है जीवन चैन का खेला 
सांझ हुए जो तू न आया
मिटटी होगा ये तन मेरा।
                                                          ___ संकल्प सक्सेना 'लवि'।


Monday, July 22, 2013





जननी को ही जीने के अधिकार से वंचित रखता है 

देवी की पूजा करता परिवार से वंचित रखता है।

ये समाज है इसका ढांचा, क्रूरों के हाथों सौंप दिया 
कहीं नन्हे भ्रूण को मार दिया, कहीं चिता की भेट चढ़ा दिया।

सर झुका दिया भारत माँ का, संस्कृति माता भी रो पड़ीं 
उनकी संतानों ने मिलकर, कलियों का जीवन नौंच लिया।

ज़रा आँख उठाकर देखो तुम, पश्चिम की आँखों में झांको 
सीखे थे जो जीना हमसे, कुछ सबक तो उनसे ले लो तुम।

गर नहीं जो संभले वक़्त रहे तो बैर प्रकृति से होगा 
तरसोगे माता, बहनों को , कोप बड़ा भीषण होगा।
                                                                ___संकल्प सक्सेना 'लवि' 

Thursday, July 4, 2013

जेब

न देखना कभी जेब किसीकी 
कहीं रूपए की नज़र न लग जाए।
                                                 ___ संकल्प सक्सेना 'लवि' 

Saturday, June 29, 2013

जो बीत गया, था समय बुरा 
जो साथ रहे वो बचपन है।

बचपन 
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बचपन तेरी हर इक बूँद में 
शीतलता की फुहार है 
तेरी बाहों में जो बीते 
वो पल सब गुलज़ार हैं। 

आज तो बस यादों में  है तू 
खुशबू सा एहसास है 
खेल पुराने जो थे खेले 
उन सायों से संसार है। 

जो बिछड़े तेरी बाहों से 
पायल की झनकार  है 
सावन में है खिली धूप 
सजनी का श्रृंगार है।

प्यार के हर अंदाज़ में है तू 
तेरि  बाहों सा एहेह्सास है 
बच्चों से भी छोटे हैं वो 
मासूम सच्चा प्यार है।

अब न जाएगा कहीं तू 
खेल नहीं है प्यार है 
बचपन तू है, उनमें है तू 
खुशियों का संसार है।
                                                        ____ संकल्प सक्सेना 'लवि'


Wednesday, May 15, 2013


तन्हाई

बसंती फूल झड़  गए
पौधों की टहनियां प्यासी हैं 
कांटे बिखरे हैं राहों में 
चलने की मेरी बारी है।

राहों में जलते पाँव मेरे
गर्मी में सुलगते घाव मेरे
नहीं दूर तलक कोई मंजिल
क्रंदन स्वर गूंजे राहों में।

मेरे दिलके हर इक कोने में
तन्हाई डाले है डेरा
रिस्ता  है खून दिल से अब
साँसों का छोटे है फेरा।

'लवि' समय की वीरां राहों में
चिता जली अरमानों की
धुंआ हुईं सब यादें हैं
अस्थि विसर्जित आहों की।
                                                                        __ संकल्प सक्सेना 'लवि'






Wednesday, May 1, 2013

टूटे सपने


टूटे सपने

कितने अरमां  थे
कितने सपने थे
शीशे से नाज़ुक
फूल से कोमल

एक झटका लगा
बिखर गया कांच
चूर हुए सपने
घायल हुए पाँव

आँखों में  आंसू
टूटे सपनों के घाव
चिल चिलाती जलन
थके हुए पाँव

फिर भी चल रहा है 'लवि'
राहों पे अपनी 
चुभे हुए कांच हैं  
लहु  लुहान हैं रास्ते। 
                                                   ____ संकल्प सक्सेना 'लवि'