Friday, May 30, 2014



आज लगभग जगजीत जी और मेहंदी हसन जी जैसे ग़ज़ल गायकों को गए २ साल से ज़्यादा समय बीत चुका है।  उम्र कि मजबूरियों की वजह से ग़ुलाम अली जी ने भी गाना छोड़ दिया है। इस दौरान कोई नया ग़ज़ल गायक न तो सामने आया न ही कोई एल्बम रिलीज़ हुयी।  ऐसा लगता है जैसे अब ग़ज़ल जो हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है, सच में दम तोड़ रही है। कोई ऐसा नज़र नहीं आता जो इसका हाथ थामे और इसे दूर तक ले जाए।  मेरी नज़र में ग़ज़ल कहने और सुनने वालों की कोई कमी नहीं है और शायद कभी नहीं होगी लेकिन कमी ऐसे लोगों को मौक़ा देने में ज़रूर आ गई है जो ग़ज़ल को आगे लेके जाना चाहते हैं।

कहाँ गई  है ग़ज़ल ?

चंद दरवाज़ों में, सिमट गई है ग़ज़ल
फिर से मौकों पे, निपट गई है ग़ज़ल।
 
फिर किसी दिल के निकट, गई है ग़ज़ल
फिर से धड़कन को, तरस गई है ग़ज़ल।

मुक़र्रर हो ! ये सदा, ग़ुम हुई है कहीं
शोर के आलम में, झुलस गई  है ग़ज़ल ।

न साक़ी हैं, न पैमाने, बज़्म खाली है
अब तो रिन्दों को, तरस गई है ग़ज़ल ।

तलत, मेहंदी के, सुरों ने संवारा था जिसे
उनके  नामों की, रह गई है ग़ज़ल।

कुछ 'मुरीद' आये हैं, दर पे उसके
अब तो अफ़साना, बन गई  है ग़ज़ल। 
                                        __ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।

Saturday, May 3, 2014


अर्थ-१ 

खोज रहे थे अर्थ 
जीवन क्यों है व्यर्थ 
भटके है ज़िन्दगानी
चारों तरफ़ अनर्थ।

अर्थ में ढूंढें अर्थ 
जीवन बना है नर्क 
नहीं मिलेगा कुछ भी 
खोज रहेगी व्यर्थ।

प्रेम का ढूंढो अर्थ 
जीवन बनेगा स्वर्ग 
गुरु प्रेम हो जाए 
तो पा जाओगे अर्थ।

राहें बड़ी कठिन हैं 
रुकना नहीं डगर में 
'मुरीद' बनके चलना 
मुराद होगा अर्थ।
__ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'। 


Wednesday, April 2, 2014




आवाहन 

जहां कभी 
ख़ुशियाँ थीं
बहारें थीं 
गीतों के गलियारे थे 
ग़ज़लों से महके ग़लीचे थे 
नज़मों में  ढलती शाम थी 
वहीं आज ख़ामोशी है,सन्नाटा है 
शाखों से टूटे पत्तों पर 
पतझड़ के चलने कि, बेबस आहट है 

लेकिन! फिर भी मुझे इक आस नज़र आती है 
फिर से कहीं वो, एक उम्मीद जगा जाती है 
अँधेरे कि चादर को हल्का सा उठाती है 
नन्ही सी गौरैया बहारों को बुलाती है 
यका याक उषा कि किरण नज़र आती है 
समर में , निशा से, उषा जीत ही जाती है 
खोए हुए कलरव को, वो फिर से जगाती है 
गाओ मेरे दीवानों , वो सबको बुलाती है। 
                                              __ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'। 

Saturday, March 29, 2014


एहसास-ए- मोहब्बत

एक  सतरंगी फ़ुहार थी, बहती मन कि बयार थी
खोती थीं दिल कि धड़कने, आँखों से रिस्ती धार थी।

खिलती कलियाँ जब बाग़ में , पीहू कोयल कि पुकार थी
भंवरों कि गुंजन, फिर वही, गीतों कि बरसती धार थी।

क्यों सागर मरुथल हो रहा, नदिया कि कैसी चाल थी
नयनों को झुका के आ गई, धड़कन सागर कि निसार थी।

मेरी पहली तहरीर थी, 'वारिस' की जैसे हीर थी
गीतों कि धुन में ढल गई, सरगम थी या वो प्यार थी।

फिर रफ्ता रफ्ता खो गयी, ज्यों धुंद सुबह के प्यार की 
ख़ुद में ही खोते हैं 'मुरीद', यादों कि इक झनकार थी।
                                                __ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।





 

Sunday, February 16, 2014

जिसे हम प्यार कहते हैं, वो जलता है शमाओं में
तड़पता है वो बिजली सा, मचलता है शुआओं में।

क़यामत बनके जो गिरती है आँखों से तेरे मानिन्द
वो बिजली कौंध जाती है, मेरे दिल कि हवाओं में।

हवा चलती है तो, जर्रों में  उठती है जवानी सी
बहारें फिर मचलती हैं, सिमटती हैं अदाओं में।


मोहब्बत दिल के ज़र्रों में, असर यूं छोड़ जाती है 
तेरी धड़कन में  खोता हूँ, मैं खोता हूँ वफ़ाओं  में।
                                         
'मुरीद' अब जान जाते हैं, कहाँ है रोशनी तेरी
तेरी साँसों की आहट से, जो बस्ती है दुआओं में।
                                              __ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।

Saturday, January 4, 2014

कुछ तो है जो आँख भींचे, ख़ींच कर लाता मुझे
और तेरी महफ़िलों में, छोड़ कर जाता मुझे।

आज तेरे रास्तों पर, बढ़ रहे मेरे क़दम
और उस रूहानियत में, छोड़ कर जाता मुझे।

जो समय कि बंदिशों के, पार है बैठा उधर,
वो समय के रास्तों पर, छोड़ कर जाता मुझे।

अनगिनत प्यालों के शीशे, जो हैं बिखरे राह में
य़ाद में  उन महफिलों की, छोड़ कर जाता मुझे।

तुम भले हो दूर कितने, फिर भी मैं हूँ देखता
एक किरन के रास्ते जो, छोड़ कर जाता मुझे।

झील है तेरी निग़ाहें, जिस में जग है डूबता
नाख़ुदा बन पार उसके, छोड़ कर जाता मुझे।

तेरे संग-ओ-दर पे है, इस आस पर बैठा 'मुरीद'
कौन है जो इस किनारे, छोड़ कर जाता मुझे।
                                         ___ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।
 

Friday, December 27, 2013



सन २०१३ जाने को है। इस बीते साल ने भी हर साल कि तरह बहुत कुछ सिखलाया।कई ऐसे पाठ जीवन के जो शायद गीता/क़ुरान या बाइबल भी आसानी से न समझा पाएं। इस सन २०१३ में बीते हर लम्हे को मेरा नमन और भावभीनि विदाई।
आप सभी का नव वर्ष २०१४ मंगलमय और सुखद हो यही शुभकामनाएं।

सांझ हो रही है 
सब तरफ हर्ष है उल्हास है 
एक सूरज जाने को है 
कोई उसे मनाने को है। 

बहुत सी यादें जो दे गया है मुझे 
कई नए मीत जो दे गया है मुझे 
कैसे जाने दूं ऐसे साक़ी को 
जो नया जाम दे गया है मुझे। 

फिर नए फूल खिल खिलाएंगे 
फिर नए गीत सरसरायेंगे 
तू कहीं दूर सो रहा होगा 
हम तुझे  में  बुलाएंगे। 

आँख से जो है रिस्ता पानी सा 
हम तुझे सीप में सजाएंगे 
होंगे मोती कई जो राहे सफ़र 
फिर तेरे गीत गुनगुनाएंगे।  

बेसबब जो है तूने सिखलाया 
उसको हर्फ-ओ-क़ुरान करते हैं 
जो अफ़ाक़-ओ-शफ़क़ में डूब गया 
क़लम-ए-इमाम इश्क़ करते हैं।
                                                  __ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।  

बेसबब- selfless /unreasonable
अफ़ाक़ - horizon, क्षितिज
शफ़क़ - सूर्यास्त के समय आकाश मैं फ़ैली लाली, redness  in  the  sky
हर्फ़- शब्द, words