Friday, January 4, 2019

इतना तो तेरे इश्क़


इतना तो तेरे इश्क़ ने, मुझको सिखा दिया 
जलने में है मज़ा, ये सबको बता दिया। 

कितनी वफ़ा मिलेगी, वफ़ा के जवाब में
उसने चला के तीर, नज़र से जता दिया। 

आइना देखकर वो कभी, मुस्कुरा दिए 
मैंने भी बिखर के, उन्हें जीना सीखा दिया। 

नैनों की रहगुज़र जो कभी रूबरू हुए 
अश्क़ों ने उन्हें हर ख़ुशी से फिर मिला दिया। 

छलके वो मेरी आँख से , ‘मुरीद’ हो गए 
प्यालों ने भी साक़ी को, रिंदाँ बना दिया। 
                                                                  _ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।

रेल

रेल

ज़िन्दगी की रेल, चल तो रही है 
मंज़िल कहाँ है, पता नहीं है।

कई नगर आते जाते हैं 
कई लोग घर कर जाते हैं 
मन का गार्ड हरी झंडी दे 
सिग्नल हुआ, चला करती है।

कई लाल सिग्नल आते हैं
ख़तरे के सूचक, आते हैं 
प्रारब्ध के हैं खेल निराले 
जो ना समझे, तो पछताते हैं।

पैन्टोग्राफ़ की माया है सब 
जब तक जुड़ा हुआ शक्ति से,
तभी तलक ये सफ़र रहेगा 
जब तक ईंधन बना रहेगा।

वरना जर्नी पूरी होगी 
मंज़िल पे गाड़ी पहुंचेगी 
सभी लोग पीछे छूटेंगे 
रेल की पटरी वहीं रहेगी।

इंजन नहीं मरा करते हैं 
बस 'मुरीद' बदला करते हैं 
फिर से कोई नए सफर पर 
साथी नए बना करते हैं। 
                                        __संकल्प सक्सेना 'मुरीद' ।

Pantograph: a jointed framework conveying a current to a train, tram, or other electric vehicle from overhead wires.

अंतिम पल





मौत है अन्तिम पड़ाव, वस्ल का भी पल यही
चार दिन का ये फ़साना, क्या कमाई कुछ हुई?

इश्क़ करता तू अगर, तेरा भी बेड़ा पार था
आज दिन है आख़िरी, अब क्यों ग्लानि हो रही?

दौलत ओ शौहरत की दुनिया, अब नहीं है तेरे संग
बस फ़क़ीरी में मज़े है, कितनी अना है अब रही?

है तमन्ना बस यही, जाएंगे जब जग से 'मुरीद'
कारवां ए आशिक़ी हो, तेरी ख़ुदाई हो रही।
                                                            --संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।
                                                 वस्ल = मिलन 
                                                    ग्लानि = पश्चाताप 
                                                           अना = अहंकार / Ego 
                                                     कारवां = जन समूह

सांझ



डूब चुका है, दिन का तारा 
डूब गई है शाम 
डूब रहा है, ये मन मेरा 
कब आओगे श्याम 
कब आओगे श्याम। 

टिम टिम करते तारे आए 
झिलमिल दीपक हैं 
मन मंदिर में, दीप जलाओ
आएंगे घनश्याम। 

सांझ की इस पावन बेला में 
सुमिरन करलो नाम 
गीत हमारे, धुन मुरली की 
आएंगे घनश्याम। 

दिन जीवन सा, सांझ है जाना 
करलो पूरण काम 
वर्ना चादर मैली होगी 
जब आएंगे श्याम। 
__संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।

Monday, September 11, 2017


जाने कहाँ

ग़ज़लें जाने कहाँ खो गईं, नज़्में जाने कहाँ खो गईं 
जीवन के इन दो राहों पे, शामें जाने कहाँ खो गईं। 


आँधियारों से रोज़ लड़ाई, परवाने का खेल हो गई
खोज रहा था वो मंज़िल को, राहें जाने कहाँ खो गईं।

दूर नज़र आई वो मुझको, आहें जाने कहाँ खो गईं
वो जब मेरे पास खड़ी थी, सांसें जाने कहाँ खो गईं।

घड़ी जो करती टिक टिक टिक टिक, ख़ामोशी कि जुबां हो गई
यादों की मौजों में बहकर, रातें जाने कहाँ खो गईं।

दर पे तेरे खोए थे हम, धड़कन जाने कहाँ खो गई
रमा हुआ था 'मुरीद' तुझ में, बज़्में जाने कहाँ खो गईं।

__संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।


नानाजी
*******
मेरे जीवन, मेरे लेखन के अभिन्न अंग,मेरे मार्गदर्शक ......उन्ही को समर्पित हैं ये जज़्बात जिन्हें शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। 
आँखें नम हैं। 

मायूस है, उदास है,
ये कैसी अनमिट प्यास है 
सब कुछ है पास मगर 
कहाँ गए जज़्बात हैं।

क़लम है, स्याही, बूँद नहीं 
दर्द है, धड़कन नहीं 
पथराई सी आँखें हैं 
बेहता कोई जुनूं नहीं

आख़िर कब तक !

आख़िर कब तक ये अफ़साने 
बनते ही घुट जाएंगे 
मेरे भीतर खिलते खिलते 
फूल यूँही मुरझाएंगे।

जिनकी साँसें, जिनकी सीरत 
मुझ में प्यास जगाती थीं 
आज नहीं हैं पास मेरे वो 
गीत मेरे क्या गाएंगे ?
आँच नहीं है उन सांसों की 
दर्द कहाँ से लाएंगे।

अब तो बस यादों के दर्पण 
'मुरीद' समझ रहे हैं दर्शन 
पुंज प्रकाश तुम थे हमारे 
मेरे गीत तुम्ही को तर्पण। 
                                                 __संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।

Wednesday, June 14, 2017




दिलों से उठती हैं, आँखों से बरसती हैं 
नूर की गलियों से, होकर वो गुज़रती हैं ।।

मौजें हैं, रवानी है, कुछ आँख में पानी है 
सागर की यही बूँदें, तूफ़ान उफ़नती हैं ।।

खोया हूँ तुझ ही में मैं , मंज़र ये निराला है 
बज़्म-ए -रुहानी में , साक़ी सी मचलती हैं ।।

रिंदों की मोहब्बत हैं, साक़ी की जवानी हैं 
हसरतें मेरे दिल की, मयख़ानों में सजती हैं ।।

'मुरीद' हूँ उनका, वो मेरे मुख़ातिब हैं 
बहकी है मेरी धड़कन, नब्ज़ समझती हैं ।।
                                        ___संकल्प सक्सेना 'मुरीद' ।