Friday, January 4, 2019

Friday



शाम है, समा है और दस्तूर भी
अब्र है, बारिश है, इश्क़ भी, 
ऐ साक़ी ! बस तेरी कमी है
इस बज़्म में मय लाज़मी है,

हुस्न के नूर से, तू पिला दे अगर
दौर ए आशिक़ी, तू चला दे अगर
क्या ख़ुमारी का मंजर बिख़र जाएगा 
इब्तेदा में, इबादत वो कर जाएगा
रोशनाई में तेरी, संवर जाएगा।
                                        --संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।

अब्र = आसमाँ ।
इब्तेदा = शुरुआत ।
इबादत = पूजा / यहां अर्थ meditation से है ।
संवरना = transformation.
ख़ुमारी = नशा ।

किताब का आखिरी पन्ना


किताब का आखिरी पन्ना,
नवल जवानी के वो हसीन पल
और बहता हुआ इश्क़ का दरिया
कोई अपने सागर को तरस रहा था
वो मोती अपने बादल को तरस रहा था।

बहारों की लाली,
वो फूलों की लाली
कोई अपने सावन को तरस रहा था
वो बगिया में झूलों को तरस रहा था।

ये पन्नों सा जीवन,
क़िताबों सी उल्झन
'मुरीद' अपने मोहन को तरस रहा था
वो मुरली की तानों को तरस रहा था।

कोई अपने सागर को तरस रहा था
वो मोती अपने बादल को तरस रहा था।
                                                         -- संकल्प सक्सेना 'मुरीद' ।


पुराना घर



पुराना घर 

जीवन के कई बीते हुए पलों को 
अपने आँगन में समेटे 
एक पुराना घर, आज भी रो रहा है 
चीत्कार है कई यादों की 
गूँज है उन एहसासों की 
जो समय की दौड़ मैं, कहीं दब गए हैं 

खण्डहर नहीं है वो, बूढ़ा हो गया है 
शिकार है अकेलेपन का, अपनों के परायेपन का 

ये यादें नहीं भटकती आत्माएं सी लगती हैं 
किसी के अहंकार का भूत भी यहीं भटकता है 
दस्तक देती है तन्हाई, इसके आँगन में 
कोई तो तड़पा होगा यहां !!

वेदनाओं का ये समन्दर, अथाह गहरा है 
भावनाओं की कई नदियाँ इसमें मिलती हैं 
किन्तु समन्दर के तल में, सिवाय ख़ामोशी के, 
कुछ भी नहीं 
हाँ...कुछ भी नहीं !!
                                                        __संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।

इतना तो तेरे इश्क़


इतना तो तेरे इश्क़ ने, मुझको सिखा दिया 
जलने में है मज़ा, ये सबको बता दिया। 

कितनी वफ़ा मिलेगी, वफ़ा के जवाब में
उसने चला के तीर, नज़र से जता दिया। 

आइना देखकर वो कभी, मुस्कुरा दिए 
मैंने भी बिखर के, उन्हें जीना सीखा दिया। 

नैनों की रहगुज़र जो कभी रूबरू हुए 
अश्क़ों ने उन्हें हर ख़ुशी से फिर मिला दिया। 

छलके वो मेरी आँख से , ‘मुरीद’ हो गए 
प्यालों ने भी साक़ी को, रिंदाँ बना दिया। 
                                                                  _ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।

रेल

रेल

ज़िन्दगी की रेल, चल तो रही है 
मंज़िल कहाँ है, पता नहीं है।

कई नगर आते जाते हैं 
कई लोग घर कर जाते हैं 
मन का गार्ड हरी झंडी दे 
सिग्नल हुआ, चला करती है।

कई लाल सिग्नल आते हैं
ख़तरे के सूचक, आते हैं 
प्रारब्ध के हैं खेल निराले 
जो ना समझे, तो पछताते हैं।

पैन्टोग्राफ़ की माया है सब 
जब तक जुड़ा हुआ शक्ति से,
तभी तलक ये सफ़र रहेगा 
जब तक ईंधन बना रहेगा।

वरना जर्नी पूरी होगी 
मंज़िल पे गाड़ी पहुंचेगी 
सभी लोग पीछे छूटेंगे 
रेल की पटरी वहीं रहेगी।

इंजन नहीं मरा करते हैं 
बस 'मुरीद' बदला करते हैं 
फिर से कोई नए सफर पर 
साथी नए बना करते हैं। 
                                        __संकल्प सक्सेना 'मुरीद' ।

Pantograph: a jointed framework conveying a current to a train, tram, or other electric vehicle from overhead wires.

अंतिम पल





मौत है अन्तिम पड़ाव, वस्ल का भी पल यही
चार दिन का ये फ़साना, क्या कमाई कुछ हुई?

इश्क़ करता तू अगर, तेरा भी बेड़ा पार था
आज दिन है आख़िरी, अब क्यों ग्लानि हो रही?

दौलत ओ शौहरत की दुनिया, अब नहीं है तेरे संग
बस फ़क़ीरी में मज़े है, कितनी अना है अब रही?

है तमन्ना बस यही, जाएंगे जब जग से 'मुरीद'
कारवां ए आशिक़ी हो, तेरी ख़ुदाई हो रही।
                                                            --संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।
                                                 वस्ल = मिलन 
                                                    ग्लानि = पश्चाताप 
                                                           अना = अहंकार / Ego 
                                                     कारवां = जन समूह

सांझ



डूब चुका है, दिन का तारा 
डूब गई है शाम 
डूब रहा है, ये मन मेरा 
कब आओगे श्याम 
कब आओगे श्याम। 

टिम टिम करते तारे आए 
झिलमिल दीपक हैं 
मन मंदिर में, दीप जलाओ
आएंगे घनश्याम। 

सांझ की इस पावन बेला में 
सुमिरन करलो नाम 
गीत हमारे, धुन मुरली की 
आएंगे घनश्याम। 

दिन जीवन सा, सांझ है जाना 
करलो पूरण काम 
वर्ना चादर मैली होगी 
जब आएंगे श्याम। 
__संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।