Friday, January 4, 2019

मैं शायर हूँ, एक दिवाना



मैं शायर हूँ, एक दिवाना

मेरा भी है, एक फ़साना ।।



दर्द जहां के, आंसू अपने
मेरी दौलत, ग़म का खज़ाना ।।

कितने पराए, कितने अपने
सबसे उल्फ़त, एक तराना ।।

मेरे ख़यालों की ये दुनिया 
उसमें अक़्सर, तेरा आना।।

मेरी मुरादें, मेरे अरमां
ये है सुलगता, एक ज़माना ।।

उसकी दस्तक़, उसकी आहट
हिज्र का है ये, दौर सुहाना ।।

कितने गीतों की मंज़िल है
दीद का मंज़र और मुस्काना ।।

मंज़िल भी, उसको मिलती है
जिसने ना, सीखा शर्माना ।।

अना की दुनिया, वफ़ा के जुमले
मजबूरी है, चलते जाना ।।

शानों पर ले, जाएंगे सब
अश्क़ों में, फिर मेरा आना ।।

दरिया है ये, खूब लुटाओ
'मुरीद' का है ये फ़रमाना ।।
                                         ©संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।
                                        02/11/2018 19:45 IST


जो लुटाने की दौलत मेरे पास है
वो लुटाने की दौलत तेरे पास है
प्यार करता रहूँ, प्यार मिलता रहे
सब ज़माने की दौलत मेरे पास है।

दिल से सागर हैं हम डूब जाओगे तुम
ये नज़र का निशाना मेरे पास है
चंद सिक्कों कि ख़ातिर न बिकता कभी
वो ज़मीरी ख़ज़ाना मेरे पास है।

हम को भाएँ फ़कीर,
वो हैं शाह ए अमीर
उन दुआओं का शजरा मेरे पास है
तुम जो आये कभी तो चढ़ा देंगे रंग
ऐसा रंगीन लहज़ा मेरे पास है।

कल चले जाएंगे, राख़ हो जाएंगे
हम धुआं बनके बादल से चिल्लाएंगे
मेरी मैं जल गई , आत्मा मिल गई
अब तो तू भी लुटा, जो तेरे पास है।

हम मुरीदों की दुनिया में आये हो तुम 
इश्क़ के हर्फ़ से स्वर्ग बनता यहां
और बहती है गंगा सदा प्यार की
तू लुटा दे, जो बूंदें तेरे पास हैं।
                                               © संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।
                                              23/10/2018 10:35 AM

मुबारक़ तुमको



अब तो सहराओं की, ये रात मुबारक़ तुमको
ये अंधेरे ये ख़यालात, मुबारक़ तुमको ।।

जाल ये कैसा बुना है, हमें उलझाने का
ये सियासत, ये सवालात मुबारक़ तुमको ।।

अपने माज़ी में ज़रा, झांक कर देखो पल भर
ये विरासत में मिली मात, मुबारक़ तुमको ।।

यमन से आए लुटेरों ने चमन लूटा था
हमारे अपनो का ही हाथ मुबारक़ तुमको ।।

हुए यतीम कई घर, वतन की राहों पर
आग से जलते, ये हालात मुबारक़ तुमको ।।

अरे ! ओ मुल्क़ के रहबर, 'मुरीद' क्या लिक्खें
सहर की आस के जज़्बात, मुबारक़ तुमको ।।
                                                       © संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।
                                                       10/10/2018 04:51 A.M.

कुछ शेर


Friday



शाम है, समा है और दस्तूर भी
अब्र है, बारिश है, इश्क़ भी, 
ऐ साक़ी ! बस तेरी कमी है
इस बज़्म में मय लाज़मी है,

हुस्न के नूर से, तू पिला दे अगर
दौर ए आशिक़ी, तू चला दे अगर
क्या ख़ुमारी का मंजर बिख़र जाएगा 
इब्तेदा में, इबादत वो कर जाएगा
रोशनाई में तेरी, संवर जाएगा।
                                        --संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।

अब्र = आसमाँ ।
इब्तेदा = शुरुआत ।
इबादत = पूजा / यहां अर्थ meditation से है ।
संवरना = transformation.
ख़ुमारी = नशा ।

किताब का आखिरी पन्ना


किताब का आखिरी पन्ना,
नवल जवानी के वो हसीन पल
और बहता हुआ इश्क़ का दरिया
कोई अपने सागर को तरस रहा था
वो मोती अपने बादल को तरस रहा था।

बहारों की लाली,
वो फूलों की लाली
कोई अपने सावन को तरस रहा था
वो बगिया में झूलों को तरस रहा था।

ये पन्नों सा जीवन,
क़िताबों सी उल्झन
'मुरीद' अपने मोहन को तरस रहा था
वो मुरली की तानों को तरस रहा था।

कोई अपने सागर को तरस रहा था
वो मोती अपने बादल को तरस रहा था।
                                                         -- संकल्प सक्सेना 'मुरीद' ।


पुराना घर



पुराना घर 

जीवन के कई बीते हुए पलों को 
अपने आँगन में समेटे 
एक पुराना घर, आज भी रो रहा है 
चीत्कार है कई यादों की 
गूँज है उन एहसासों की 
जो समय की दौड़ मैं, कहीं दब गए हैं 

खण्डहर नहीं है वो, बूढ़ा हो गया है 
शिकार है अकेलेपन का, अपनों के परायेपन का 

ये यादें नहीं भटकती आत्माएं सी लगती हैं 
किसी के अहंकार का भूत भी यहीं भटकता है 
दस्तक देती है तन्हाई, इसके आँगन में 
कोई तो तड़पा होगा यहां !!

वेदनाओं का ये समन्दर, अथाह गहरा है 
भावनाओं की कई नदियाँ इसमें मिलती हैं 
किन्तु समन्दर के तल में, सिवाय ख़ामोशी के, 
कुछ भी नहीं 
हाँ...कुछ भी नहीं !!
                                                        __संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।