Sunday, November 13, 2011

पता नहीं


पता नहीं

कुछ  है तू मेरे लिए
क्या है ? पता नहीं

सूरज की किरण है
या चंदा की रौशनी
क्या है ? पता नहीं
कहीं दरख़्त की छांव है
या जीवन की नाव है 
क्या है पता नहीं

शिल्पकार की मार है
कहीं प्यार भरी सौगात है
क्या है पता नहीं

फ़लक पे छ रही है
मेरे दिल को लुभा रही है
चाँद चमकता रहे
खुद को जला रही है
क्यों ? पता नहीं

मेरे दिल की आवाज़ है
या गीतों का साज़ है
क्या है पता नहीं
शायर की ग़ज़ल है 
या कवी का प्रकाश है 
क्या है पता नहीं

मेरे जीवन की ज्योत है
राहों का प्रकाश है
क्यों ? पता नहीं

क्या कहूं, शायर की अभिलाषा है तू
क्यों ? पता नहीं ।
                                                                                               ___संकल्प सक्सेना ।
                                                   

Monday, October 24, 2011

॥ शुभ दीपावली॥




यह अंधेरों का जलवा है, सजदे में उजाले हैं 

यह रात का जलवा है, सजदे में सितारे हैं

यह हुस्न का जलवा है, संग अँधेरे उजाले हैं ।
                          
__संकल्प सक्सेना ।                                                                                                                                           

॥ शुभ दीपावली॥



बिखरती ज़ुल्फें हैं, अमावास की रात है,
दमकती शमा है, दीपावली की रात है ।
                                                                         __ संकल्प सक्सेना ।

Monday, October 10, 2011

श्रद्धांजलि


श्रद्धांजलि 

दोस्तों, आज सुबह की ख़बर कुछ ऐसी पड़ी मेरे कानो पर
रोने लगी कलम मेरी नैनों से बरसे नीर।

फिर ख़ामोश हुए ग़ालिब,
फिर से चुप हैं मीर,
आज ख़ामोश है ग़ज़ल
नज़्म बहा रही है नीर ।

बदला था हमें उन ने 
अब छोड़ गए हैं
दे गए हैं यादें
हम संभालेंगे पीर ।
                            ___ संकल्प सक्सेना.

Saturday, September 24, 2011

कविता


कविता 

धड़कने तेज होने लगती हैं
मन खोने लगता है
जब नाम कभी तुम्हारा लब पे आता है,
प्रेम के समंदर में मन गोते लगता है
जब नाम कभी तुम्हारा, लब पे आता है ।

कभी संगीत सहलाता है
कहीं ग़ज़ल बनती है
कभी अनाहद नाद
मेरे दिल को भाता है
जब नाम कभी तुम्हारा, लब पे आता है ।

मैं भी तो तुम्हारी राह का पथिक हूँ
कहीं राह न भटकूँ,
प्रेम के दीप जलदो
सदा रहूँगा चरणों में
बस एक बार आवाज़ लगादो ।
                                   ___ संकल्प सक्सेना 


                                     

Saturday, September 17, 2011

जीवन


जीवन

तनहा सी शाम है
चुभता हुआ सन्नाटा है,
सब कुछ है पास में,
फिर भी नमी है आँख में।

यादों का बवंडर है,
कहीं सुरूर, कहीं बेचैनी का मंज़र है।

जीवन  इक अगन है,
कहीं जलन, कहीं सुलगन है।

आँखों में है कई अरमां
कहीं कोशिश,
कहीं मुक़ाम हैं।

क्या कमाएगा? 
क्या लेजएगा इंसान?
कहीं राख़,
कहीं मिट्टी है ।
                                             __ संकल्प सक्सेना 

Sunday, September 11, 2011

याद

याद

तुम्हारी याद मैं झुलसता हूँ अब मैं,
इस दर्द के सहारे जीता हूँ  अब मैं,
कि आओगे तुम नज़दीक मेरे,
तेरी राह को ही तकता हूँ अब मैं,
तुम्हारी याद मैं झुलसता हूँ अब मैं ।

कलि तो अब बनी होगी फूल,
महके आँगन को तरसता हूँ अब मैं
ये सावन कि बारिश ,बगिया कि ख़ामोशी, 
झूलों कि अचलता , समझता हूँ मैं,
तुम्हारी याद मैं झुलसता हूँ अब मैं ।

तेरे आने से महकेगा सावन ,
सावन में वसंत को तरसता हूँ अब मैं
हे कान्हा ! मेरे इस दर्द को समझो
तेरे आसरे अब तो बैठा हूँ अब मैं
तुम्हारी याद मैं झुलसता हूँ अब मैं ।
                                                    ___संकल्प सक्सेना.