Tuesday, October 9, 2012

एक बरस पहले






हमारे दिल अज़ीज़ ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह जी को श्रद्धांजलि

एक बरस पहले

एक बरस पहले
रोई थीं ग़ज़लें
सिसकी थीं नज़्में
मौसिक़ी का फ़रिश्ता रुला जा रहा था ।

ग़म था छाया फ़िज़ां में
छलके मयक़दे भी
पीर से दिल का अम्बर फटा जा रहा था
मौसिक़ी का फ़रिश्ता रुला जा रहा था ।

दिल कोने में छिपकर
पीर ग़ालिब की छलकी
मीर के आंसुओं सा बहा जा रहा था
मौसिक़ी का फ़रिश्ता रुला जा रहा था ।

आज भी गूंजती हैं
फ़िज़ा में सदायें
हर्फ़ आते हैं लब पे, जैसे तेरी दुआएं
'लवि' यादों में तेरी बहा जा रहा था
मौसिक़ी का फ़रिश्ता चला जा रहा था
मौसिक़ी का फ़रिश्ता रुला जा रहा था ।

                                                                                ___ संकल्प सक्सेना 'लवि' ।

Sunday, September 23, 2012

राहें


राहें

कुछ ऐसी राहें होती हैं
कुछ ऐसे सपने होते हैं
जो हमको बुन्नी पड़ती है 
जो हमको पाने होते हैं ।

करीब हम उनके जाते हैं
वो शर्मा के मुड़ जाती है
हम छूने जाते हैं उनको
वो नाज़ हमें दिखलाती हैं 

कुछ ऐसी राहें होती हैं ......

दिल से होके वो जाती हैं 
नज़रों में वो बस जाती हैं
हम राहों पे जो बढ़ते हैं
वो अदा हमें दिखलाती हैं

कुछ ऐसी राहें होती हैं ......

मिलता रास्ता पगडंडी से
वो हमसफ़र हो जाते हैं
क़लम से राहें बनती हैं
स्याही सपने भर जाती हैं 

कुछ ऐसी राहें होती हैं
कुछ ऐसे सपने होते हैं
जो हमको बुन्नी पड़ती है 
जो हमको पाने होते हैं ।              
                                  ___ संकल्प सक्सेना                     




Wednesday, September 19, 2012

वृक्ष और बादल


वृक्ष और बादल


बादल कभी बरसे नहीं 
प्यासे इन्सां के लिया
ये तो बरसे हैं उनके लिए
जो झुलसे सबकी छाँव के लिए ।

क्या किया मानव ने उनके लिए
जले जो सबकी छाँव के लिए
क्या जिया कभी है ये ख़ुद भी
और के जीवन प्रान के लिए 

जल जल के तन है हरा किया
महके पवन, वसुधा के लिए
मानव ने चलाई विष वायु
अपने ही निज स्वार्थ के लिए 

इसलिए नहीं बरसे जलधर
जहां इंसां बस्ती बनता है
ये तो बरसे उस तरु के लिए
जो जला है प्यासी माँ के लिए  
                                                                 ___ संकल्प सक्सेना 

चिराग




चिराग


है चिराग लेकिन बुझा नहीं
तूफानों मैं है जला वही
अंधियारे का है शत्रु वो

और उजियारे का लाल वही ।


झंझावाती काले बादल
गरजे उस पर, बुझ जाने को,
तब चमकी बिजली आसमान से
उसक का ढाढस बंधवाने को ।



लहराई शमा, प्रेयसी उसकी
कहा साथ रहेंगे जनम जनम
जो हाथ लगाया दीपक को
मैं भस्म करूंगी बादल को ।



बादल बिखरे, सूरज आया
सहलाने अपने बालक को
वंदन में सारा जग उसके 
जिसने जीता अंधियारे को ।
                              ___संकल्प सक्सेना ।



बेमन से जब मौत ने बाहें अपनी फैलायीं , बतलाया नाम ' शहादत'
हंस के प्राण न्यौछावर कर दिए और ब्याह गए ' शहादत' ।
                                                                                     ___ संकल्प सक्सेना ।

Saturday, May 26, 2012

मेरी कोशिशों के सामने खड़ा है, मेरे मौला
मैं भी दिखादूंगा, दीवानगी किसको कहते हैं ।
                                             संकल्प सक्सेना ।

Thursday, May 24, 2012


है प्रेम द्वंद्व छिड़ा हुआ,
कविता यहाँ की मिट्टी है
हथ्यार क़लम और स्याही हैं
यही कवी की सृष्टि है ।
                 ___संकल्प सक्सेना ।