Monday, July 22, 2013





जननी को ही जीने के अधिकार से वंचित रखता है 

देवी की पूजा करता परिवार से वंचित रखता है।

ये समाज है इसका ढांचा, क्रूरों के हाथों सौंप दिया 
कहीं नन्हे भ्रूण को मार दिया, कहीं चिता की भेट चढ़ा दिया।

सर झुका दिया भारत माँ का, संस्कृति माता भी रो पड़ीं 
उनकी संतानों ने मिलकर, कलियों का जीवन नौंच लिया।

ज़रा आँख उठाकर देखो तुम, पश्चिम की आँखों में झांको 
सीखे थे जो जीना हमसे, कुछ सबक तो उनसे ले लो तुम।

गर नहीं जो संभले वक़्त रहे तो बैर प्रकृति से होगा 
तरसोगे माता, बहनों को , कोप बड़ा भीषण होगा।
                                                                ___संकल्प सक्सेना 'लवि' 

Thursday, July 4, 2013

जेब

न देखना कभी जेब किसीकी 
कहीं रूपए की नज़र न लग जाए।
                                                 ___ संकल्प सक्सेना 'लवि' 

Saturday, June 29, 2013

जो बीत गया, था समय बुरा 
जो साथ रहे वो बचपन है।

बचपन 
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बचपन तेरी हर इक बूँद में 
शीतलता की फुहार है 
तेरी बाहों में जो बीते 
वो पल सब गुलज़ार हैं। 

आज तो बस यादों में  है तू 
खुशबू सा एहसास है 
खेल पुराने जो थे खेले 
उन सायों से संसार है। 

जो बिछड़े तेरी बाहों से 
पायल की झनकार  है 
सावन में है खिली धूप 
सजनी का श्रृंगार है।

प्यार के हर अंदाज़ में है तू 
तेरि  बाहों सा एहेह्सास है 
बच्चों से भी छोटे हैं वो 
मासूम सच्चा प्यार है।

अब न जाएगा कहीं तू 
खेल नहीं है प्यार है 
बचपन तू है, उनमें है तू 
खुशियों का संसार है।
                                                        ____ संकल्प सक्सेना 'लवि'


Wednesday, May 15, 2013


तन्हाई

बसंती फूल झड़  गए
पौधों की टहनियां प्यासी हैं 
कांटे बिखरे हैं राहों में 
चलने की मेरी बारी है।

राहों में जलते पाँव मेरे
गर्मी में सुलगते घाव मेरे
नहीं दूर तलक कोई मंजिल
क्रंदन स्वर गूंजे राहों में।

मेरे दिलके हर इक कोने में
तन्हाई डाले है डेरा
रिस्ता  है खून दिल से अब
साँसों का छोटे है फेरा।

'लवि' समय की वीरां राहों में
चिता जली अरमानों की
धुंआ हुईं सब यादें हैं
अस्थि विसर्जित आहों की।
                                                                        __ संकल्प सक्सेना 'लवि'






Wednesday, May 1, 2013

टूटे सपने


टूटे सपने

कितने अरमां  थे
कितने सपने थे
शीशे से नाज़ुक
फूल से कोमल

एक झटका लगा
बिखर गया कांच
चूर हुए सपने
घायल हुए पाँव

आँखों में  आंसू
टूटे सपनों के घाव
चिल चिलाती जलन
थके हुए पाँव

फिर भी चल रहा है 'लवि'
राहों पे अपनी 
चुभे हुए कांच हैं  
लहु  लुहान हैं रास्ते। 
                                                   ____ संकल्प सक्सेना 'लवि' 

Wednesday, March 20, 2013


चश्म - ए - यार का ममनून इस क़दर 
इखलास इनायतें, इश्क़ शाम- ओ- सेहर।। 

रूदाद-ए -मोहब्बत और नाज़नी का नूर 
नाबर्द-ए -इश्क़ संग हिज्र का ये सफ़र।।

क़ार-ए-मोहब्बत आसां नहीं मगर 
उशाक़ बढ़ चले, इश्क की ये डगर।। 

और क्या कहें ?  'असद/लवि ' पशेमान हैं 
महफ़िल-ए-शौक़ है, मुखलिस नहीं मगर।। 
                                          ___संकल्प सक्सेना 'लवि'।

चश्म - ए - यार: eyes of beloved
ममनून : शुक्रगुज़ार 
इखलास: selfless 

रूदाद-ए -मोहब्बत: Tale of  Love 
नाबर्द-ए -इश्क़ : struggle in love
हिज्र: separation
 
क़ार-ए-मोहब्बत: task in love
उशाक़: आशिक़ का बहुवचन          

असद : कवि/शायर 
महफ़िल-ए-शौक़: Gathering of Love
 मुखलिस: जिसे हम प्यार करते हैं, beloved.

Friday, March 15, 2013

हम तो वो मोती हैं ,जो कहीं गहराई लिए बैठे हैं 
सीप की नर्म बाहों में,तन्हाई लिए बैठे हैं।
                                                               __संकल्प सक्सेना 'लवि'।