Sunday, October 13, 2013


पंछी बन पन्ने उड़े, आशाओं के पार
जीवन ज्योति खिल उठी, अरमां तारणहार ।।

जीवन पन्नों की किताब, ये रंगों का खेल
जीवन पन्ने ख़त्म हुए, कर्मों से है मेल ।।
                                       __ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।


खुली किताब






खुली किताब

मेरा जीवन एक खुली किताब
जगमगाता, मचलता, रोशन चिराग
मैं भी इसे कहाँ ले चला
तिमिर के पन्ने, था जीवन उदास।

समय के पन्ने पलटते गए
मुझको नज़र आयी फिर एक आस
शायद अंधेरों ने तोड़ा था दम
मुझको नज़र आये मेरे सनम।

मैं था कि पन्ने पलटता नहीं
ये थी की पंखों को देती उड़ान
सहसा ही खुला आरिज़-इ ग़ुलाब
उड़ चली ज़िंदगी प्रीत की फिर उड़ान।

पंछी से पन्नों में महके गुलाब
सुहाना है मंज़र, सुनहरी किताब
'मुरीद अब तो जीवन है उड़ता जहाज़
वो बाहों में  मेरे, समंदर के पार।
                                             __ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'।

Sunday, September 8, 2013

लब -ए-ग़ज़ल
 
 लब -ए- ग़ुलाब ढूंढ़ते हैं अपना सहारा
अक़्स चूमते हैं, कहें अपना सहारा।।

गलीचा बन महक उठा है, हुस्न तुम्हारा
खुशबू चमन में ढूंढती है, अपना सहारा।।

वो शोख हैं, हसीन हैं, खिलते गुलाब हैं
हम ख़ार ही सही, मगर हैं उनका सहारा।।

ज़ीनत हैं अपने बाग़ की, माली के चश्म ओ नूर
बाहों में भर के लाऊंगा मैं अपना सहारा।।

झुकते हुए चराग हैं, जलवा ए शौक़ है
सजदे में ख़ुमारी है, यही अपना सहारा।।

हुस्न की छवि में कहाँ खो गए 'मुरीद'
हस्ति ए ग़म , ढूंढते हैं अपना सहारा।।
                                                                               __ संकल्प सक्सेना 'मुरीद'

Friday, September 6, 2013


सैनिक 

जो त्याग शौर्य की मूरत हैं 
वो वीर हमारे सैनिक हैं 
जिन्हें देख के दुश्मन थर्राता 
वो वीर हमारे सैनिक हैं।

त्यागे थे अपने घर उनने 
त्यागे थे सब सुख जीवन के 
वो चले थे राह हिमालय की 
ज्यों संत अवतरित भू तल पे।

छोटा सा है जीवन इनका 
और कर्म बड़े हैं जीवन से 
लोगों के दिल में  घर करते 
ज्यों संत पुरुष हों युग युग से।

हवन  कुंड है रण इनका 
हों यज्ञ देश की रक्षा के 
समिधा में अर्पित तनमन है 
ज्यों ऋषि हमारे इस युग के।

त्यगि, तपस्वी, संत, ऋषि 
देखा है सबको वीरों में 
सब शीश झुकाते रब आगे 
यह शीश चढ़ें 'माँ' चरणों में।
                            ___ संकल्प सक्सेना 'लवि'। 



सायों की रहगुज़र

ता उम्र का सफ़र, सायों की रहगुज़र 
नयनों की राह से, अश्क़ों की रहगुज़र।।

बचपन से जवानी, सायों की ज़ुबानी 
ये खेल समय का, ख़्वाबों की रहगुज़र।।

साँसों में महक है, आँखों में तरन्नुम 
ये दौर-ए-जवानी, बाहों की रहगुज़र।।

जो रूठ गए हैं, वो आ नहीं सकते 
बिछड़े हैं जो साक़ी, जामों की रहगुज़र।।

आहों के सहारे, हर्फों की रहगुज़र
साये में क़लम के, ग़ज़लों की रहगुज़र।।
                                                __ संकल्प सक्सेना 'लवि'।

Saturday, August 3, 2013

तन्हाई 

नीला नभ है, नीला सागर 
बीच में है आशाओं का घर 
खोल के खिड़की देख रहा हूँ 
अम्बर तक तन्हाई का घर।

तट रेखा से, क्षितिज पटल तक 
नैनो से फिर हृदय पटल तक 
नील नभी तन्हाई छाई 
यादों की विस्मृत शहनाई।

मैं जो देखूं खिड़की बाहर 
दूर तलक सागर ही सागर 
क्षार हुई अंसुवन से मेरे 
छलकी है लहरों की गागर।

उमस रहा है तन मन मेरा 
नहीं है जीवन चैन का खेला 
सांझ हुए जो तू न आया
मिटटी होगा ये तन मेरा।
                                                          ___ संकल्प सक्सेना 'लवि'।


Monday, July 22, 2013





जननी को ही जीने के अधिकार से वंचित रखता है 

देवी की पूजा करता परिवार से वंचित रखता है।

ये समाज है इसका ढांचा, क्रूरों के हाथों सौंप दिया 
कहीं नन्हे भ्रूण को मार दिया, कहीं चिता की भेट चढ़ा दिया।

सर झुका दिया भारत माँ का, संस्कृति माता भी रो पड़ीं 
उनकी संतानों ने मिलकर, कलियों का जीवन नौंच लिया।

ज़रा आँख उठाकर देखो तुम, पश्चिम की आँखों में झांको 
सीखे थे जो जीना हमसे, कुछ सबक तो उनसे ले लो तुम।

गर नहीं जो संभले वक़्त रहे तो बैर प्रकृति से होगा 
तरसोगे माता, बहनों को , कोप बड़ा भीषण होगा।
                                                                ___संकल्प सक्सेना 'लवि' ।